ये बारिश
ये बारिश ,जाने क्यों हर बार नयी सी लगती है , कितनी ही बार मैं अपने शब्दों को इसकी बूंदों से भिगा चुकी हूँ , पर फिर भी ये बूंदे मुझे है बार अधूरी सी लगती हैं , और हर बार मैं कोशिश करती हूँ , इन्हें एक खूबसूरत चेहरा पहनाने का ,और जाने कितनी बार मैं भीगती हूँ, पर फिर भी ये बूंदे मुझे हर बार की तरह कोरा ही छोड़ जाती हैं , और फिर से ये बरसती हैं ,और मैं , हमेशा की ही तरह जुट जाती हूँ अपने शब्दों को इसकी हर बूँद से भिगाने , कि कभी तो शायद किसी एक बूँद में मुझे धनक दिखे , कभी तो ये बादलों की गड़गड़ाहट मैं भी सुनूं तसल्ली से और कुछ अपने मन की भी कह दूँ , कह दूँ कि उड़ना है मुझे भी संग तेरे ,भीगना है मुझे तेरी बारिश में , महसूस करनी है छुअन तेरी हर एक बूँद की ,जो तर कर जाये मेरी साँसों को, कि हाँ अधूरी हूँ मैं ,मुझे पूरा कर दे ,मुझे पूरा कर दे ||